भगवान के घर और रायपुर नगर निगम में देर है, अंधेर नहीं।
गर्मी भर लोग पानी के लिए तरसते रहे। निगम के चक्कर लगाते रहे। अब देखिए, माननीय महापौर जी ने ऐसी ऐतिहासिक व्यवस्था की, कि पानी खुद चलकर लोगों के घर पहुँच गया। पाइपलाइन से नहीं, नालियों से सही—आख़िर पानी, पानी ही होता है।
और सबसे बड़ी बात, इस योजना में कोई भेदभाव नहीं हुआ। पॉश कॉलोनियाँ हों या बस्तियाँ, सबको समान अधिकार से नाले का पानी मिला। ऐसी समता का उदाहरण शायद संविधान लिखने वालों ने भी न सोचा हो।
लोग कहते थे कि रायपुर के तालाब खत्म हो रहे हैं। निगम ने उनकी चिंता भी दूर कर दी। अब सड़कें तालाब हैं, अंडरब्रिज तालाब हैं, ओवरब्रिज के नीचे तालाब हैं। शहर ने जल संरक्षण का ऐसा मॉडल पेश किया है कि पानी को कहीं जाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।
फिर भी जनता का मन बड़ा चंचल है। पूछ रही है कि ड्रेनेज सिस्टम और व्यवस्था के नाम पर मिलने वाले करोड़ों रुपये कहाँ गए। अरे भाई, तुम्हें हर जगह भ्रष्टाचार ही दिखता है! कभी जनसेवा भी देख लिया करो।
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