तुलसी जयंती समारोह में रामभक्ति, साहित्य और संस्कृति का हुआ भव्य संगम

तुलसी साहित्य विमर्श, विराट कवि सम्मेलन, भक्तिमय प्रस्तुतियाँ एवं सम्मान समारोह गरिमापूर्वक सम्पन्न

बिलासपुर। पावन तुलसी जयंती के अवसर पर ओंकारेश्वर महादेव मंदिर परिसर, सागा लेआउट, शुभम विहार, बिलासपुर में आयोजित तुलसी साहित्य विमर्श, विराट कवि सम्मेलन, भजन-संगीत एवं सम्मान समारोह श्रद्धा, भक्ति, साहित्य और भारतीय संस्कृति के अद्भुत संगम के साथ गरिमापूर्वक सम्पन्न हुआ। आयोजन में विद्वतजनों, साहित्यकारों, कवियों, मानसप्रेमियों, समाजसेवियों एवं बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की उपस्थिति रही।

अध्यक्ष डॉ. रमेश चंद्र श्रीवास्तव का ऊर्जापूर्ण आध्यात्मिक उद्बोधन

समारोह की अध्यक्षता करते हुए डॉ. रमेश चंद्र श्रीवास्तव ने अपने ऊर्जापूर्ण एवं आध्यात्मिक उद्बोधन में कहा कि “तुलसी केवल एक कवि नहीं, बल्कि भारतीय चेतना के ऐसे महामनीषी हैं, जिन्होंने श्रीराम के चरित्र में सम्पूर्ण मानवता के आदर्शों को प्रतिष्ठित किया। रामचरितमानस हमारे लिए केवल पाठ करने का ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन को जीने की कला सिखाने वाला दिव्य मार्गदर्शक है।”

उन्होंने कहा कि “जब मनुष्य के भीतर अहंकार बढ़ता है, तब मानस उसे विनय सिखाता है; जब जीवन में संघर्ष आता है, तब राम का धैर्य संबल देता है; जब समाज में अविश्वास बढ़ता है, तब राम-भरत का प्रेम संबंधों की पवित्रता का बोध कराता है और जब जीवन में अंधकार छाता है, तब तुलसी की वाणी प्रकाश बनकर मार्ग दिखाती है।”

डॉ. श्रीवास्तव ने कहा कि आज की युवा पीढ़ी को केवल आधुनिक ज्ञान ही नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने की भी आवश्यकता है। उन्होंने आह्वान किया कि “हम मानस को केवल मंदिरों और आयोजनों तक सीमित न रखें, बल्कि उसके आदर्शों को अपने आचरण, परिवार, समाज और राष्ट्रजीवन में उतारें। जिस दिन राम का आदर्श हमारे व्यवहार में उतर जाएगा, उसी दिन समाज में मर्यादा, संवेदना और सद्भाव का नया प्रभात होगा।”
उन्होंने तुलसी जयंती को आत्मचिंतन और सांस्कृतिक जागरण का पर्व बताते हुए कहा कि “तुलसी की वाणी में भक्ति की शक्ति है, राम के चरित्र में जीवन की दिशा है और मानस के मर्म में मानवता का कल्याण है। आइए, हम सब मिलकर तुलसी के विचारों को जन-जन तक पहुंचाने और नई पीढ़ी के हृदय में भारतीय संस्कारों की ज्योति प्रज्वलित करने का संकल्प लें।” उनके इस उद्बोधन से पूरा परिसर जय श्रीराम और तुलसीदास जी के जयघोष से गूंज उठा।
समारोह के मुख्य अतिथि श्री रामलाल बरेठ ने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के माध्यम से भारतीय समाज को भक्ति के साथ संस्कार, मर्यादा, कर्तव्य और लोकमंगल का संदेश दिया। तुलसी साहित्य आज भी हमारे जीवन को सही दिशा देने में पूरी तरह प्रासंगिक है।
अतिविशिष्ट अतिथि डॉ. विनय कुमार पाठक, थावे विद्यापीठ विश्वविद्यालय, बिहार एवं पूर्व अध्यक्ष, राजभाषा आयोग ने कहा कि तुलसी साहित्य भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर है। रामचरितमानस केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन, लोकमंगल और मानवीय मूल्यों का विश्वकोश है। आवश्यकता है कि तुलसी के साहित्य को नई पीढ़ी तक नई भाषा और नए माध्यमों के साथ पहुंचाया जाए।
अतिविशिष्ट अतिथि न्यायमूर्ति डॉ. चंद्रभूषण बाजपेयी, पूर्व न्यायाधीश, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने कहा कि तुलसीदास जी ने राम के चरित्र के माध्यम से न्याय, नीति, कर्तव्य, करुणा और मर्यादा का आदर्श प्रस्तुत किया है। मानस का संदेश आज के समाज में भी उतना ही आवश्यक है, जितना उसके रचनाकाल में था।
विशिष्ट अतिथि डॉ. श्याम लाल निराला, पूर्व प्राचार्य, जे.पी. महाविद्यालय, बिलासपुर ने कहा कि तुलसी का साहित्य भारतीय समाज की आत्मा को स्पंदित करता है। मानस में जीवन के प्रत्येक पक्ष के लिए मार्गदर्शन मिलता है। तुलसी जयंती जैसे आयोजन साहित्य और संस्कार को समाज से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं।
विशिष्ट अतिथि शंकर गेंदले, एसडीओ, सिंचाई विभाग, छत्तीसगढ़ शासन ने कहा कि तुलसी साहित्य हमारी सांस्कृतिक चेतना की आधारशिला है। आवश्यकता है कि हम तुलसी के आदर्शों को केवल समारोहों तक सीमित न रखकर अपने व्यवहार और सामाजिक जीवन में उतारें।
मानस विमर्श में तुलसी साहित्य की समकालीन प्रासंगिकता पर मंथन
कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण मानस विमर्श रहा, जिसमें डॉ. सत्यनारायण तिवारी, डॉ. अंकुर शुक्ला सहित अन्य विद्वानों ने तुलसी साहित्य, रामचरितमानस के जीवन-दर्शन, लोकमंगल, मर्यादा, भक्ति एवं वर्तमान सामाजिक संदर्भों पर सारगर्भित विचार प्रस्तुत किए।
वक्ताओं ने कहा कि तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के माध्यम से धर्म को लोकजीवन से जोड़ा और समाज को सत्य, त्याग, सेवा, करुणा, कर्तव्य एवं मर्यादा का संदेश दिया। मानस की यही जीवनोपयोगी दृष्टि आज के बदलते सामाजिक परिवेश में भी मानवता को दिशा प्रदान कर सकती है।
भक्ति-संगीत एवं कवि सम्मेलन ने बांधा समां
समारोह में विभिन्न भजन मंडलियों एवं कलाकारों द्वारा प्रस्तुत भक्तिमय गीतों ने पूरे परिसर को राममय बना दिया। श्रीमती मयूरी खंडेलवाल, सुश्री मयंशी खंडेलवाल तथा विभिन्न भजन मंडलियों की प्रस्तुतियों ने वातावरण को भक्तिरस से सराबोर कर दिया।
इसके पश्चात आयोजित विराट कवि सम्मेलन में वरिष्ठ साहित्यकारों एवं कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से श्रोताओं को साहित्यिक आनंद से अभिभूत किया। विजय कल्याणी तिवारी, अमृतलाल पाठक, बुधराम यादव शिवशरण श्रीवास्तव, अशोक शर्मा ‘अद्वितीय’, मयंक मणि दुबे, डॉ. राघवेन्द्र दुबे एवं दीपक दुबे ‘सागर’ सहित अनेक साहित्यकारों की सहभागिता रही।
सम्मान समारोह में प्रतिभाओं का हुआ अभिनंदन
समारोह के दौरान साहित्य, समाज, संस्कृति एवं मानस परंपरा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले विभिन्न व्यक्तित्वों का सम्मान किया गया। धर्मभूषण सहित विभिन्न सम्मानों से विद्वानों एवं साहित्यकारों का अभिनंदन किया गया।
संयोजक एवं सह-संयोजक ने व्यक्त किया आभार
संयोजक विष्णु कुमार तिवारी ने आयोजन की सफलता पर सभी अतिथियों, विद्वानों, साहित्यकारों, कवियों, भजन मंडलियों, सहयोगियों एवं उपस्थित जनसमुदाय के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह आयोजन तुलसी साहित्य को जन-जन तक पहुंचाने और नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति की जड़ों से जोड़ने का विनम्र प्रयास है। जिस आत्मीयता और उत्साह के साथ सभी ने सहभागिता की, वह आयोजन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
सह-संयोजक दीपक दुबे ‘सागर’ ने कहा कि तुलसी जयंती का यह आयोजन साहित्य, भक्ति और संस्कृति को एक मंच पर लाने में सफल रहा। मानस के संदेश को समाज और विशेषकर युवाओं तक पहुंचाने के लिए ऐसे आयोजन निरंतर होते रहने चाहिए।
अंत में आयोजन समिति ने सभी अतिथियों, विद्वानों, साहित्यकारों, कवियों, कलाकारों, सहयोगियों एवं श्रद्धालुओं के प्रति आभार व्यक्त किया। समारोह का समापन भक्तिमय वातावरण में हुआ।
तुलसी जयंती समारोह ने एक बार फिर यह संदेश दिया—
“जहाँ मानस का मर्म है, वहाँ संस्कार हैं;
जहाँ राम का आदर्श है, वहाँ मर्यादा है;
और जहाँ तुलसी की वाणी है, वहाँ भारतीय संस्कृति की अमर चेतना है।”
डाॅ.रमेश चन्द्र श्रीवास्तव
आई.एस.एस.